जब मैं धुंड रहा था,
मुझे वो दुनियाभर नजर ना आया,
थक कर जब बैठा आसन पर,
मेरे अंदर बस वो हि वो नजर आया...
क्या धुंडोगे मुझे तुम,
मेरा मतलब ही तू है.
तू नही तो मैं भी नही,
जाओ फिर धुंडो कही,
ना समझ पाया जो यह खेल,
वो आज भी राह भटका है,
जो सांझा मेरा खेल,
उसे मैने अपनाया है,
ना संग रहेना ना जिद पाने की,
नाम तू सदा जपता रहे,
फिर फिकीर तुझे काहेकी...
नाम मे बसा ले तू मुझे,
मे सदा तेरा साथ दु,
मे बसा सबमे हुं,
बस सदा संग नाम हू...
नाम से ना कोई प्यारा हमे,
ऐ जिंदगी ना खेल तू संग,
खेल हि मेरा नामस्मरण है,
बंद कर तू तेरी दुकान....
जब हम नाम से ईश्वर के भितर है,
तो काहे की है हमे पुकार.
नाम हि हमारा सर्वस्व है चाहें आये आंधी या तुफान...
जय गिरनारी
श्री स्वामी समर्थ